Monday, November 16, 2015

शिया मुसलमान {भाग 4} -- कश्मीर का इस्लामीकरण (एक अकाट्य ऐतिहासिक सच)

मीरवाइज यानि प्रमुख शिक्षक / Chief Preacher


जम्मू कश्मीर के कश्मीर घाटी में मीरवाइज या Chief Preacher की दो वंशावली है अर्थात दो प्रमुख मीरवाइज घराने हैं जो कश्मीर के एक करोड मुसलमानों के घोषित मजहबी नेतृत्व हैं और घाटी के इन करोड मुसलमानों के "मजहबी आध्यात्मिक नेता" हैं।

इन दो मीरवाइज घरानों में से प्रमुखतम घराना श्रीनगर से नेतृत्व करता है और श्रीनगर की जामा मस्जिद पर आधिपत्य रखता है, दूसरा घराना दक्षिणी कश्मीर क्षेत्र के मुसलमानों का नेतृत्व करता है, इनमें से प्रत्येक वंश परंपरागत रूप से सोलहवीं शताब्दी में ईरान के हमादान ( Hamadan, Iran) से घाटी में आये अपने पूर्वज "शेख आमिर कुबरावी " के वंशज होने को ही प्रतिनिधित्व करता है, वो भी मूल जडों से जुडे रह कर।

दोनो परिवारों में एक ही समय मीरवाइज उपाधि को सिर्फ एक या दो सदस्य ही धारण कर सकते हैं वो भी कुरान, सुन्ना (Sunnah) की गहन जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद, इसमें भी सबसे प्रमुखतम तथ्य यह है कि कुरान या सुन्ना की गहन जानकारी सिर्फ आधिकारिक रूप से किसी इस्लामिक ज्ञान की यूनीवर्सिटी से प्राप्त करना जरूरी है, इस्लामिक यूनीवर्सिटी से इस्लाम, कुरान, सुन्ना का गहन अध्ययन करके ज्ञान लेने से पहले इन आगामी मीरवाईज को अपने ही घर के वरिष्ठ सदस्यों तथा विशेष शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है।



                       मीरवाइज मोहम्मद उमर फारूख़

हाल फिलहाल प्रमुख पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी कश्मीरी मीरवाइज का नाम है (उपाधि सहित)  "मीरवाइज मोहम्मद उमर फारूख़" जो कश्मीर की हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का एक प्रमुख नेता है।

कश्मीरी 'मुसलमानों' से जुडा बहुत ही प्रमुख तथ्य यह है कि वो लोग खुद को काशुर (Kashur) कहना, कहलाना पसंद करते हैं और स्वयं को काशुर / काशर ही कहते बोलते हैं, कश्मीर में इस्लाम का आगमन कश्मीर के हिन्दू राजा सुहादेव (सहदेव) के समय हुआ था,राजा सुहादेव के समय पहला इस्लामिक प्रचारक (मिशनरी) कश्मीर आया था जिसका नाम "सय्यद शराफुद्दीन अब्दुर्रहमान सुहारवर्दी (Syed Sharaf-ud-Din Abdur Rahman Suhrawardi) था और उसे जनता के बीच प्रचलित प्रसिद्ध  बुलबुल_शाह नाम से भी जाना जाता था, इसके बाद सन् 1320 ई. में तत्कालीन कश्मीर के शासक राजा सुहादेव उर्फ रिंचन शाह ने बुलबुल शाह के सानिध्य में इस्लाम कबूल कर लिया और वो इतिहास में कश्मीर के पहले मुसलमान राजा सुल्तान शद्दरूदीन शाह (Sultan Saddrudin Shah) के नाम से जाना गया, फिर उसके दामाद ने भी इस्लाम कबूल कर लिया जो कि उसका प्रमुख सेनापति था, मुसलमान बनने के बाद सेनापति को शाहमीर के नाम से जाना गया, फिर अचानक सन् 1339 ई. में इस दामाद ने साम्राज्य पर कब्जा कर लिया और कश्मीर को पहला इस्लामिक शासक वंश मिला जिसे इतिहास में शाहमीर वंश कहा जाता है, तत्पश्चात कश्मीर में इस्लाम की प्रमुखतम मिशनरी का आगमन हुआ जिस वजह से यूँ कह लें कि कश्मीर को मुसलमान बनाने में सबसे बडा हाथ सूफी - शिया इस्लाम का ही रहा है और इसमें सबसे बडा नाम है इस्लामिक मिशनरी उर्फ मजहबी प्रचारक शाह - ऐ - हामादान अर्थात मीर सय्यद अली हामादानी उर्फ शेख आमिर अली कुबरावी का, जो ईरान से अपने 700 अनुयायियों और मददगारों के साथ  कश्मीर आया था (पहला अनाधिकृत मीरवाइज कह लें उसे ) उसका जोर लोगों के इस्लामीकरण के लिए था, और उसका मुख्य लक्ष्य कश्मीरी शाही परिवार के इस्लामीकरण और इस्लामिक शरिया अदालत लागू करने पर ही था, जिसके लिये उस ईरानी ने आम कश्मीरी लोगों के लिये अपने साथ आये 700 अनुयायियों और मददगारों का उपयोग किया जो शॉल व कालीन बुनाई में सिद्धहस्त थे और उन्ही लोगों ने कश्मीरी लोगों को ईरानी तरीकों से शॉल, बुनाई तथा कालीन बनाना सिखाया, इससे आम कश्मीरी लोगों की आर्थिक स्थिती में सकारात्मक बदलाव हुऐ और वो इस्लामीकरण की मुहिम के तहत हंसी खुशी मुसलमान बनते गये, कभी कश्मीर की कुल मुस्लिम जनसंख्या में शिया मुस्लिम 70% तक थे और आज कश्मीर में लगभग 23 लाख शिया मुस्लिम हैं जो कश्मीर की मुस्लिम जनसंख्या का लगभग 25% तक जनसंख्या है।


पाक अधिकृत कश्मीर में शिया मुसलमानों की ही अधिकता है, गिलगित - बाल्टिस्तान और उत्तरीय इलाकों में शिया कश्मीरी मुसलमान बहुसंख्यक हैं जिनमें बालटिस्तान की 98% आबादी शिया है.और गिलगित की 60% जनसंख्या शिया मुस्लिम है।

जम्मू कश्मीर राज्य में श्रीनगरबडगाम , पुलवामा  , कुपवाड़ाबारामूला शिया बहुल इलाकों के रूप में है साथ ही बन्दीपुर तथा लद्दाख के भी कुछ इलाके शिया बहुल आबादी के हैं, ध्यान देने योग्य हैं कि लद्दाख को छोड बाकी ये सभी अशांत तथा आतंकवाद प्रभावित इलाके हैं

वर्तमान के कश्मीरी मुसलमानों में तीन फिरके हैं -
1. सुन्नी
2. शिया ( जफ़रिया )
3. शिया ( इस्माइली )
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लिखी जा रही मेरी एक पुस्तक का मामूली व संपादित अंश .

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